31 अगस्त 2019 - 14:04
मुहर्रम पर विशेष कार्यक्रम- 1

बलिदान, त्याग और साहस की याद दिलाने वाला मुहर्रम का महीना शुरू हो गया है।

यह वह महीना है जिसमें आजसे लगभग चौदह सौ साल पहले, ख़ून ने तलवार को पराजित कर दिया था और सत्य की ताक़त ने असत्य को हमेशा के लिए धूल चटा दी थी। यह वह महीना है जिसने पूरे इतिहास में सभी पीढ़ियों को अत्याचार के मुक़ाबले में जीतने का रास्ता दिखाया और सत्य के मुक़ाबले में बड़ी शक्तियों की पराजय को संसार की आंखों के सामने सिद्ध किया। कर्बला में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के नाती हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के दिन निकट आते ही सभी इस्लामी देशों के सभी शहरों से मुहर्रम की ख़ुशबू आने लगती है। शहरों की दीवारों पर लगे हुए पोस्टर व बैनर, ऊंची इमारतों पर स्थापित इमाम हुसैन का अलम या पताका और लोगों के काले वस्त्र इस बात के सचूक होते हैं कि मुहर्रम का महीना और इमाम हुसैन का शोक मनाने के दिन आ गए हैं।

मुहर्रम, हिजरी शमसी कैलेंडर के बारह महीनों में से पहले महीने का नाम है जिसका अर्थ होता है हराम या वर्जित किया गया। इस महीने का नाम मुहर्रम रखने का कारण यह है कि इस महीने में युद्ध शुरू करना हराम या वर्जित है। बनी उमय्या ने वर्ष 61 हिजरी के मुहर्रम महीने में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके परिजनों व साथियों का ख़ून बहा कर न केवल यह कि इस वर्जित महीने का सम्मान नहीं किया बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के परिजनों के सम्मान को भी रौंद दिया। चूंकि मुहर्रम का महीना, कर्बला और आशूरा की घटना की याद दिलाता है इस लिए उसका आगमन दिलों को दुखी कर देता है। इमाम हुसैन के मानने और चाहने वाले मुहर्रम की चांद रात से ही काले वस्त्र धारण कर लेते हैं और अपने घरों में दीवारों पर काले कपड़े लगाते हैं। इसी तरह वे उस शहीद इमाम की याद में शोक सभाएं आयोजित करते हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम कहते हैं कि निश्चित रूप से इमाम हुसैन की शहादत के दिन ने हमारी दिल को घायल कर दिया है और हमारे आंसुओं की धारा को बहा दिया है और हमें प्रलय तक के लिए दुखी कर दिया है तो रोने वालों को इमाम हुसैन जैसे मज़लूम इंसान पर रोना चाहिए। इसी तरह उन्होंने यह भी कहा है कि जब मुहर्रम का महीना आता था तो मेरे पिता को कोई हंसता हुआ नहीं देख सकता था। पहली मुहर्रम से दसवीं मुहर्रम तक उनके दुख और व्याकुलता में वृद्धि होती रहती थी। आशूरा का दिन उनके दुख और रोने का दिन होता था और वे यह वाक्य बार बार दोहराते थे कि आज का दिन वह दिन है जिसमें हुसैन को शहीद किया गया।

कर्बला की घटना, संसार की उन महानतम घटनाओं में से एक है जिसकी याद चौदह शताब्दियां बीत जाने के बाद आज भी मनाई जाती है और इसके प्रभाव में तनिक भी कमी नहीं आई है। समय की धूल, इतिहास की हर घटना को धुंधला बना देती है किंतु जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, वैसे-वैसे कर्बला की घटना और अधिक स्पष्ट तथा प्रकाशमान होती जा रही है और हर बीतते दिन के साथ अधिक से अधिक लोग इस घटना की ओर आकृष्ट होते जा रहे हैं। शोक मनाने की संस्कृति एक उच्च व संपन्न संस्कृति है जो चौदह सौ बरसों से पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुंची है और इसके लिए पैग़म्बर के परिजनों ने अत्यधिक कठिनाइयां सहन की हैं। यह संस्कृति हमें हज़ारो पाठ सिखाती है।

पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शोक सभाओं के आयोजन पर बल देते हुए इसके कार्यक्रमों को इस प्रकार तैयार किया है कि ये सभाएं लोगों के बीच एकता का ध्रुव बन जाएं। वे लोगों को इमाम हुसैन की शोक सभाएं आयोजित करने के लिए प्रोत्साहित करते थे और इसके माध्यम से लोगों में ज्ञान व दूरदर्शिता पैदा करके उन्हें बिखरने से रोकते थे। इस प्रकार से कि आज इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के दिनों में विभिन्न वर्गों, जातियों, धर्मों व संप्रदायों के करोड़ों लोग गली-कूचों और हर स्थान पर उनका शोक मनाते हैं और उनके झंडे के नीचे आने को अपने के लिए गर्व समझते हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के परिजनों की हदीसों में इमाम हुसैन व उनके साथियों की शहादत और मज़लूमियत पर आंसू बहाने के लिए अत्यधिक पुण्य का उल्लेख किया गया है। इसका कारण यह है कि इस आंसू बहाने और दूसरी बातों पर आंसू बहाने में काफ़ी अंतर है। यह रोना, अक्षमता व असहायता के कारण नहीं है बल्कि यह सम्मान व गर्व का चिन्ह है। यह रोना, उस चौदह सौ वर्षीय सभ्यता के मज़बूत सहारे का चिन्ह है जिसकी जीवनदायक शिक्षाओं का प्रकाश, इतिहास की उतार-चढ़ाव भरी राहों में मनुष्य का मार्गदर्शक है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम का कथन है कि ईश्वर के बंदों के लिए सभी मामलों में रोना और चिल्लाना अप्रिय है, सिवाय इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के शोक में रोने और चिल्लाने के क्योंकि इस मामले में रोने वालों को परलोक में प्रतिफल व पारितोषिक मिलेगा।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का शोक मनाने वाले, उनके और उनके वफ़ादार साथियों की शोक सभाओं में भाग लेकर उनके व्यक्तित्व और आत्मा की महानता से अवगत होते हैं और उन्हें ऐसे संपूर्ण इंसानों के रूप में पाते हैं जिनमें धैर्य, संयम, वफ़ादारी, प्रतिरोध, त्याग व बलिदान जैसे सद्गुण पाए जाते हैं और उनमें से हर एक भलाइयों व सद्गुणों का आदर्श व प्रतीक है। इससे भी अहम बात यह है कि इमाम हुसैन का शोक मनाने वाले उनकी मज़लूमियत और उन पर पड़ने वाली मुसीबतों को याद करके उन पर रोते हैं और इस तरह वे उनके साथ भावनात्मक जुड़ाव के माध्यम से उनके प्रति अपनी पहचान को मज़बूत बनाते हैं। जो दिल इमाम हुसैन और पैग़म्बर के परिजनों से प्यार करेगा वह निश्चित रूप से उनके दुख में आंसू भी बहाएगा और आंसू बहा कर उनके प्रति अपने हार्दिक प्रेम व श्रद्धा को दर्शाएगा। वह इमाम हुसैन व शहादत की संस्कृति से, शहीदों के मार्ग पर चलने का वादा करेगा।

ईरान के महान बुद्धिजीवी और वरिष्ठ धर्मगुरू शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी का कहना है कि शहीद पर रोना रणभूमि में उसके साथ तलवार चलाने, उसकी आत्मा से समन्वय और उसके मार्ग पर चलने पर सहमति का चिन्ह है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने महान व्यक्तित्व और साहसिक शहादत के कारण करोड़ों लोगों के दिलों के स्वामी हैं। इस महान व मूल्यवान और भावनात्मक ख़ज़ाने की रक्षा की ज़िम्मेदारी जिन लोगों पर है, अर्थात धार्मिक वक्ता, अगर वे महान हुसैनी आत्मा से संसार के लोगों की आत्माओं को समन्वित करने की अपनी ज़िम्मेदारी को सही ढंग से निभाएं तो एक पूरा संसार सुधर सकता है। फ़्रान्स के एक विचारक मॉरिस देकोबरा, शोक मनाने के विरोधियों के जवाब में कहते हैं कि अगर उन्हें आशूरा की वास्तविकता का ज्ञान हो जाता तो वे इन शोक सभाओं को पागलपन नहीं समझते क्योंकि (इमाम) हुसैन के मानने वाले इन सभाओं में यह सीखते हैं कि अत्याचार व शोषण को सहन नहीं करना चाहिए क्योंकि उनके नेता का नारा, अत्याचार के सामने घुटने न टेकना था।

 

जर्मनी के प्रख्यात दार्शनिक व पूर्वी मामलों के विशेषज्ञ मेसियो मार्बिन अपनी किताब इस्लामी राजनीति में लिखते हैं कि हमारे कुछ इतिहासकारों का अज्ञान इस बात का कारण बना कि वे शियों द्वारा इमाम हुसैन का शोक मनाए जाने को पागलपन बताएं लेकिन उनकी बातें पूरी तरह से निराधार हैं और उन्होंने शियों पर आरोप लगाया है। हमने जातियों व राष्ट्रों के बीच शियों जैसे उत्साही व जीवित लोग नहीं देखे हैं क्योंकि उन्होंने इमाम हुसैन का शोक मना कर बड़ी बौद्धिक नीति अपनाई है और सफल धार्मिक आंदोलनों को अस्तित्व प्रदान कर रहे हैं। जो भी शियों की प्रगति व उत्थान की प्रक्रिया की समीक्षा करेगा और पिछले सौ बरसों में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का शोक मनाने वालों के जीवन का अध्ययन करेगा वह समझ जाएगा कि शिया अपनी परिपूर्णता के अंतिम चरण तक पहुंच गए हैं। सौ बरस पहले तक भारत में (हज़रत) अली व हुसैन के पद चिन्हों पर चलने वाले बहुत कम थे लेकिन आज वे धार्मिक दृष्टि से इस देश में तीसरे नंबर पर हैं और संसार के अन्य क्षेत्रों में भी यही स्थिति है। मेरा मानना है कि इस्लाम के बाक़ी रहने और प्रगति करने तथा मुसलामनों की परिपूर्णता का एक बड़ा कारण इमाम हुसैन की शहादत की दुख भरी घटना है और मुझे पूरा विश्वास है कि मुसलमानों की बौद्धिक नीति और उनके जीवनदायक कार्यक्रम का क्रियान्वयन, इमाम हुसैन का शोक मनाए जाने के माध्यम से ही है। जब तक मुसलमानों में यह बात बाक़ी रहेगी तब तक वे कभी भी अपमान सहन नहीं करेंगे और किसी के भी जाल में नहीं फंसेंगे।

हर साल इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और आशूरा के आंदोलन की याद, लोगों के मन में पहले से अधिक मज़बूत और जीवित होती जा रही है। इमाम हुसैन एक क्रांतिकारी व अत्याचार से टक्कर लेने वाले पवित्र इंसान के रूप में संघर्षकर्ताओं का आदर्श बने हुए हैं। उन्होंने सत्य व न्याय प्रेम के आधार पर एक ईश्वरीय आंदोलन शुरू किया जिसमें सभी के लिए महानता व गौरव लहरें मार रहा है। वे सुंदर व पवित्र जीवन बिताने के लिए एक अत्यंत उचित शिक्षक हैं। यद्यपि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन को लगभग चौदह सदियां बीत चुकी हैं लेकिन समय उनके और आशूरा के आंदोलन के नाम को भुला नहीं सका है।

जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है, इमाम हुसैन के आंदोलन की महानता के आयाम अधिक व्यापक होते जा रहे हैं। वर्तमान समय में भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन अत्याचारग्रस्त लोगों, जातियों व राष्ट्रों में प्रतिरोध की भावना उत्पन्न करता है और उन्हें तटस्थता से दूर रखता है। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई इस संबंध में कहते हैं कि इमाम हुसैन ने व्यवहारिक दृष्टि से पूरे इस्लामी इतिहास को एक बड़ा पाठ दिया और वास्तव में इस्लाम को अपने काल में भी और आने वाले समय में भी पूरी तरह से सुरक्षित कर दिया। जिस स्थान पर भी उस जैसी बुराई होगी, उससे मुक़ाबले के लिए इमाम हुसैन वहां जीवित होंगे और अपने व्यवहार से बताएंगे कि हमें क्या करना है और हमारी ज़िम्मेदारी क्या है? यही कारण है कि इमाम हुसैन और कर्बला की याद बाक़ी रहनी चाहिए क्योंकि कर्बला, यह व्यवहारिक पाठ सभी की आंखों के सामने रखती है।